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अशोक विजयादशमी शांति, समानता और मानवता का संदेश देने वाला ऐतिहासिक अवसर : श्रीप्रकाश सिंह निमराजे

 


सम्राट अशोक के धम्म-विजय के आदर्श और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के धम्म परिवर्तन से प्रेरणा लेकर जागरूक, समतामूलक एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समाज बनाने का आह्वान

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) । ग्वालियर। अशोक विजयादशमी के अवसर पर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि अशोक विजयादशमी केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि शांति, करुणा, समानता, सामाजिक न्याय और मानवता के मूल्यों को आत्मसात करने का प्रेरणादायी अवसर है। यह दिवस हमें इतिहास से सीख लेने, विचारों को समझने और जागरूक समाज के निर्माण के लिए सामूहिक प्रयास करने का संदेश देता है।

श्री निमराजे ने कहा कि सम्राट अशोक के जीवन में कलिंग युद्ध के बाद आया परिवर्तन इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। युद्ध में हुई व्यापक जनहानि और मानवीय पीड़ा ने उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने धम्म-विजय, नैतिक आचरण, प्रजा के कल्याण और धार्मिक सहिष्णुता को विशेष महत्त्व दिया। उनके शिलालेखों में युद्ध के परिणामों पर पश्चात्ताप तथा मानवीय कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता के प्रमाण मिलते हैं। यह इतिहास हमें सिखाता है कि वास्तविक महानता दूसरों पर विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि हिंसा, घृणा और अन्याय को समाप्त करने के प्रयासों में निहित है।

उन्होंने कहा कि 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा बौद्ध धम्म स्वीकार करना भारतीय सामाजिक इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। इस ऐतिहासिक धम्म परिवर्तन ने सामाजिक समानता, आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव से मुक्ति के आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। यह दिवस धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में भी स्मरण किया जाता है। विजयादशमी के अवसर पर संपन्न इस ऐतिहासिक घटना का महत्त्व केवल धार्मिक परिवर्तन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज निर्माण के संकल्प से भी जुड़ा था।

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि भगवान बुद्ध का धम्म हमें प्रज्ञा, करुणा, मैत्री और नैतिक आचरण का मार्ग दिखाता है, जबकि डॉ. आंबेडकर का विचार-दर्शन शिक्षा, संगठन, संघर्ष और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता की प्रेरणा देता है। इन मूल्यों को जीवन में अपनाकर ही सामाजिक असमानताओं को दूर करने और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अशोक विजयादशमी का संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक है। समाज में जातिगत भेदभाव, सामाजिक वैमनस्य, असहिष्णुता और अवसरों की असमानता जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक संवाद और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना आवश्यक है। महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा सामाजिक विकास के समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए सरकार, सामाजिक संस्थाओं और नागरिकों को मिलकर कार्य करना चाहिए।

श्री निमराजे ने सामाजिक संगठनों और युवाओं से आह्वान किया कि वे अशोक विजयादशमी को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखें, बल्कि इसे जनजागरूकता, शिक्षा सहायता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और जरूरतमंद परिवारों की सहायता जैसे रचनात्मक कार्यों से जोड़ें। सम्राट अशोक और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों पर अध्ययन-चर्चा, व्याख्यान और पुस्तक प्रदर्शनियों के माध्यम से नई पीढ़ी को इतिहास एवं सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से परिचित कराया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इतिहास का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब उससे वर्तमान को बेहतर बनाने की प्रेरणा मिले। करुणा को व्यवहार में, समानता को सामाजिक संबंधों में, विवेक को निर्णयों में और न्याय को कार्यप्रणाली में स्थान देना ही इन महान ऐतिहासिक परंपराओं के प्रति सच्चा सम्मान है।

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने अंत में कहा कि अशोक विजयादशमी पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि घृणा के स्थान पर मैत्री, भेदभाव के स्थान पर समानता, हिंसा के स्थान पर शांति और अज्ञान के स्थान पर ज्ञान को अपनाते हुए ऐसे समाज के निर्माण में योगदान देंगे, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, न्याय और विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

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