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भागदौड़ में जीवन का मूल्य? भूल गया इंसान

 


दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य ने सबसे कीमती चीज को ही भुला दिया है - अपने जीवन का मूल्य। और जब जीवन का मूल्य ही नहीं समझा, तो कायदे-कानून का मूल्य क्या समझेगा?

हर तरफ सिर्फ भागम-भाग है। सुबह उठते ही ऑफिस की टेंशन, ट्रैफिक का जाम, पैसों की दौड़। इस दौड़ में इंसान मशीन बन गया है।

जीवन की कीमत पर जल्दी

सड़क पर देखिए, 2 मिनट बचाने के लिए लोग 200 की स्पीड में बाइक दौड़ाते हैं। हेलमेट नहीं पहनते, रेड लाइट तोड़ देते हैं। उन्हें लगता है समय बच रहा है, पर वो अपना जीवन ही दांव पर लगा देते हैं।

कानून क्यों बेमानी हो गया?

जब इंसान को अपने जीवन की ही परवाह नहीं, तो वो कानून की परवाह क्यों करेगा?

टाइम नहीं है: लोग कहते हैं - "कानून पालन करने का टाइम किसके पास है?

"संस्कार खत्म: परिवार में अब कानून, संविधान की बात ही नहीं होती।

जुगाड़ भारी: लगता है कि पैसे से सब मैनेज हो जाएगा।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में हमें जीने का अधिकार दिया, सुरक्षा दी। लेकिन हम उसी संविधान को भूलकर, खुद अपने जीवन को खतरे में डाल रहे हैं।

सोचने वाली बात

क्या 2 मिनट जल्दी पहुंचना, आपके पूरे जीवन से ज्यादा कीमती है?

क्या ट्रैफिक नियम तोड़ना बहादुरी है या बेवकूफी?

कानून कोई बोझ नहीं, बल्कि आपके जीवन की सुरक्षा कवच है। कायदे में रहना गुलामी नहीं, समझदारी है।समय आ गया है कि हम इस भागदौड़ में थोड़ा रुकें, और याद करें - जीवन अनमोल है। कानून इसी जीवन को बचाने के लिए बना है।

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