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दिखावे की दुनिया में असली इंसानियत कहाँ है? एक चिंतन

 


दिल्ली , समाजहित एक्सप्रेस ( रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया ) । इस दुनिया में लोग हमें कैसे देखते हैं, क्या आपने कभी सोचा है? वे लोग हमारे दिखावे को देखते हैं, हमारी वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं। दिखावा, जिसे हम अपनी असली पहचान छिपाने के लिए बनाते हैं।

आप किसी भी व्यक्ति को एक खास नज़रिए और सोच से देख सकते हैं, लेकिन फिर भी एक पहलू ऐसा होता है जो मौजूद तो होता है फिर भी नज़रों से ओझल होता है।

प्यार करो या नफरत, पर वास्तविकता को नजरअंदाज मत करो

सच यही है कि आप किसी इंसान के बारे में सोचे बिना उससे नफ़रत नहीं कर सकते और आप किसी इंसान के बारे में सोचे बिना उससे प्यार नहीं कर सकते। प्यार करो या नफ़रत, लेकिन वास्तविकता को नज़रअंदाज़ मत करो। हर भावना के पीछे एक सोच है, एक कारण है।

इंसानियत: जो बिना रिश्ते के भी जिंदा है

आप सड़क पर जा रहे हैं और कोई अनजान व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त होकर अचेत पड़ा दिखता है। यह देखकर जैसे-जैसे आप अपने अंदर गहराई में जाएंगे, आपको न तो प्यार मिलेगा और न ही नफ़रत। आपको बस उस घायल व्यक्ति के प्रति एक ज़बरदस्त दया मिलेगी, जो बिना किसी रिश्ते के आप में मौजूद है।

आप उस घायल के जीवन को बचाने के लिए उसे हॉस्पिटल पहुंचाते हैं। आप चाहें तो इसे मानवता के प्रति सहानुभूति या प्यार कह सकते हैं, लेकिन इस तरह का दयाभाव इस बात की परवाह नहीं करता कि वह अनजान व्यक्ति कौन है।

यही हमारी असली पहचान है। दिखावे से परे, जो बिना जात-पात, धर्म, अमीर-गरीब देखे, सिर्फ इंसान को इंसान समझती है।

सोचने की बात: किसी भी स्थिति के बारे में दो से ज़्यादा राय हो सकती हैं। इसलिए किसी को भी उसके दिखावे से मत आंकिए, उसकी मानवता को पहचानिए।

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