साहित्य
के माध्यम से समाजहित में
सामाजिक सरोकारों को व्यापक स्तर
तक पहुंचाया जा सकता है।
दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस l रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति परिषद (पंजी.) तथा आत्मज्ञान पब्लिकेशन एंड फाउंडेशन (पंजी.) के संयुक्त तत्वावधान में रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति समागम–2026 एवं सम्मान समारोह का आयोजन रविवार को डॉ. अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी, जयपुर के रमाबाई सभागार में किया गया।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विख्यात साहित्यकार श्री रतन कुमार सांभरिया रहे। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री टीकम चंद बोहरा (IAS), वरिष्ठ इतिहासकार श्री हरिराम मीणा, श्री गोवर्धन लाल सौकरिया (IPS) तथा वरिष्ठ इतिहासकार श्री मुरारी लाल शर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर किशोरी लाल पथिक ने की।
श्री टीकम चंद बोहरा (IAS) ने कहा कि
“समाज की वास्तविक पहचान
उसके साहित्य से होती है।”
उन्होंने साहित्य को समाज की
वैचारिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम
बताया। वरिष्ठ इतिहासकार श्री हरिराम मीणा ने कहा कि
यह इतिहास का कटु सत्य
है कि जिसके पास
शासन-सत्ता होती है, वह प्रायः इतिहास
और साहित्य के लेखन को
अपने पक्ष में प्रभावित करता है। उन्होंने इतिहास के पुनर्पाठ और
वंचित समुदायों की आवाज को
इतिहास में स्थान दिए जाने की आवश्यकता पर
बल दिया।
श्री
गोवर्धन लाल सौकरिया (IAS) ने कहा कि
साहित्य समाज में जागृति और चेतना पैदा
करने का महत्वपूर्ण कार्य
करता है। साहित्य के माध्यम से
सामाजिक सरोकारों को व्यापक स्तर
तक पहुंचाया जा सकता है।
वरिष्ठ इतिहासकार श्री मुरारी लाल शर्मा ने कहा कि
इतिहास लेखन की परंपरा निरंतर
बदल रही है और अब
इतिहास के लेखन में
वंचित एवं दलित समुदायों के अनुभवों, संघर्षों
और योगदान को भी स्थान
दिया जाने लगा है। उन्होंने इसे इतिहास लेखन में आए महत्वपूर्ण परिवर्तन
के रूप में रेखांकित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर किशोरी लाल पथिक ने कहा कि
साहित्य नेतृत्व और सामाजिक चेतना
का सर्वोत्तम मंच है। उन्होंने समाज के विकास के
लिए साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की
सक्रिय भूमिका को आवश्यक बताया।
परिषद के अध्यक्ष श्री
रामनिवास रैगर ने स्वागत उद्बोधन
में कहा कि “रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति समागम–2026 अपने आप में एक
अद्वितीय एवं ऐतिहासिक पहल है।
यह
आयोजन रैगर समाज की समृद्ध कला,
साहित्य, संस्कृति एवं गौरवशाली विरासत को संरक्षित करने,
उसे व्यापक पहचान दिलाने तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की
दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
परिषद
के महासचिव डॉ. मुकेश कुमार वर्मा ने बताया कि
कार्यक्रम के अवसर पर
अतिथियों द्वारा ‘रैगर समाज की अमूल्य सांस्कृतिक
थाती’ ग्रंथ का विमोचन किया
गया। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ
रैगर समाज की कला, साहित्य,
संस्कृति, परंपराओं एवं सामाजिक विरासत को संरक्षित करने
की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास
है। समारोह में रैगर समाज के प्रतिभाशाली साहित्यकारों
तथा विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित किया
गया। सम्मान के अंतर्गत प्रथम
पुरस्कार ₹21,000, दो द्वितीय पुरस्कार
₹11,000-₹11,000 तथा छह पुरस्कार ₹5,100-₹5,100 की नगद राशि,
सम्मान-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए।
कार्यक्रम
के द्वितीय सत्र में “समाज के विकास में
साहित्य की भूमिका” विषय
पर विशेष व्याख्यान एवं चर्चा-परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें
विभिन्न साहित्यकारों, विद्वानों एवं बुद्धिजीवियों ने साहित्य की
सामाजिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण, इतिहास
एवं संस्कृति के संरक्षण तथा
नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक
विरासत से जोड़ने जैसे
महत्वपूर्ण विषयों पर विचार व्यक्त
किए।
कार्यक्रम
में देशभर से आए साहित्यकारों,
कलाकारों, कवियों, बुद्धिजीवियों, युवाओं एवं समाजबंधुओं की उल्लेखनीय सहभागिता
रही।
दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस l रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति परिषद (पंजी.) तथा आत्मज्ञान पब्लिकेशन एंड फाउंडेशन (पंजी.) के संयुक्त तत्वावधान
में रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति समागम–2026 एवं सम्मान समारोह का आयोजन रविवार
को डॉ. अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी, जयपुर के रमाबाई सभागार
में किया गया।
प्राप्त जानकारी
के मुताबिक कार्यक्रम के
मुख्य अतिथि विख्यात साहित्यकार श्री रतन कुमार सांभरिया रहे। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में
श्री टीकम चंद बोहरा (IAS), वरिष्ठ इतिहासकार श्री हरिराम मीणा, श्री गोवर्धन लाल सौकरिया (IPS) तथा वरिष्ठ इतिहासकार श्री मुरारी लाल शर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर
किशोरी लाल पथिक ने की।
श्री टीकम चंद बोहरा (IAS) ने कहा कि
“समाज की वास्तविक पहचान
उसके साहित्य से होती है।”
उन्होंने साहित्य को समाज की
वैचारिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम
बताया। वरिष्ठ इतिहासकार श्री हरिराम मीणा ने कहा कि
यह इतिहास का कटु सत्य
है कि जिसके पास
शासन-सत्ता होती है, वह प्रायः इतिहास
और साहित्य के लेखन को
अपने पक्ष में प्रभावित करता है। उन्होंने इतिहास के पुनर्पाठ और
वंचित समुदायों की आवाज को
इतिहास में स्थान दिए जाने की आवश्यकता पर
बल दिया।
श्री
गोवर्धन लाल सौकरिया (IAS) ने कहा कि
साहित्य समाज में जागृति और चेतना पैदा
करने का महत्वपूर्ण कार्य
करता है। साहित्य के माध्यम से
सामाजिक सरोकारों को व्यापक स्तर
तक पहुंचाया जा सकता है।
वरिष्ठ इतिहासकार श्री मुरारी लाल शर्मा ने कहा कि
इतिहास लेखन की परंपरा निरंतर
बदल रही है और अब
इतिहास के लेखन में
वंचित एवं दलित समुदायों के अनुभवों, संघर्षों
और योगदान को भी स्थान
दिया जाने लगा है। उन्होंने इसे इतिहास लेखन में आए महत्वपूर्ण परिवर्तन
के रूप में रेखांकित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर किशोरी लाल पथिक ने कहा कि
साहित्य नेतृत्व और सामाजिक चेतना
का सर्वोत्तम मंच है। उन्होंने समाज के विकास के
लिए साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की
सक्रिय भूमिका को आवश्यक बताया।
परिषद के अध्यक्ष श्री
रामनिवास रैगर ने स्वागत उद्बोधन
में कहा कि “रैगर कला, साहित्य एवं संस्कृति समागम–2026 अपने आप में एक
अद्वितीय एवं ऐतिहासिक पहल है।
यह
आयोजन रैगर समाज की समृद्ध कला,
साहित्य, संस्कृति एवं गौरवशाली विरासत को संरक्षित करने,
उसे व्यापक पहचान दिलाने तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की
दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
परिषद
के महासचिव डॉ. मुकेश कुमार वर्मा ने बताया कि
कार्यक्रम के अवसर पर
अतिथियों द्वारा ‘रैगर समाज की अमूल्य सांस्कृतिक
थाती’ ग्रंथ का विमोचन किया
गया। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ
रैगर समाज की कला, साहित्य,
संस्कृति, परंपराओं एवं सामाजिक विरासत को संरक्षित करने
की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास
है। समारोह में रैगर समाज के प्रतिभाशाली साहित्यकारों
तथा विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित किया
गया। सम्मान के अंतर्गत प्रथम
पुरस्कार ₹21,000, दो द्वितीय पुरस्कार
₹11,000-₹11,000 तथा छह पुरस्कार ₹5,100-₹5,100 की नगद राशि,
सम्मान-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए।
कार्यक्रम
के द्वितीय सत्र में “समाज के विकास में
साहित्य की भूमिका” विषय
पर विशेष व्याख्यान एवं चर्चा-परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें
विभिन्न साहित्यकारों, विद्वानों एवं बुद्धिजीवियों ने साहित्य की
सामाजिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण, इतिहास
एवं संस्कृति के संरक्षण तथा
नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक
विरासत से जोड़ने जैसे
महत्वपूर्ण विषयों पर विचार व्यक्त
किए।
कार्यक्रम
में देशभर से आए साहित्यकारों,
कलाकारों, कवियों, बुद्धिजीवियों, युवाओं एवं समाजबंधुओं की उल्लेखनीय सहभागिता
रही।
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