— बाबू लाल बारोलिया, अजमेर (राजस्थान)
भारत
में मानव समाज का ताना-बाना
परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों से
बुना गया है। सनातन संस्कृति में जीवन की शुचिता, मर्यादा
और निरंतरता को बनाए रखने
के लिए गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि
तक सोलह संस्कारों का विधान तय
किया गया है। लेकिन कौतूहल और गहन विचार
का विषय यह है कि
हमारे समाज, विशेषकर मरुधरा राजस्थान में गहराई तक पैठी "पगड़ी
रस्म" या "पाग दस्तूर" का इन 16 धार्मिक
संस्कारों में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में, पगड़ी रस्म कोई धार्मिक अधिष्ठान या अनिवार्य वैदिक
संस्कार नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप
से एक सामाजिक-प्रशासनिक
परंपरा है, जिसका इतिहास राजशाही और सत्ता के
हस्तांतरण से जुड़ा हुआ
है। आज के आधुनिक,
शिक्षित और प्रबुद्ध समाज
में इस परंपरा के
वर्तमान स्वरूप, इससे जुड़ी कुप्रथाओं और इसकी प्रासंगिकता
पर पुनर्विचार करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इतिहास के
झरोखे
से:
राजशाही
से
पारिवारिक
सत्ता
का
सफर:
पगड़ी
रस्म के उद्गम को
समझने के लिए हमें
भारत, और विशेषकर राजस्थान
के प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास
को देखना होगा। ऐतिहासिक काल में जब किसी राजा
या रियासत के शासक की
मृत्यु होती थी, तो राज्य की
सुरक्षा, स्थिरता और अराजकता से
बचने के लिए उत्तराधिकार
का निर्धारण तुरंत आवश्यक होता था।
शाही राजतिलक
और
पाग
दस्तूर:
राजा के ज्येष्ठ पुत्र
या घोषित उत्तराधिकारी की 'ताजपोशी' की जाती थी।
भरे दरबार में सामंतों, पुरोहितों और जनता के
सामने राजकुमार के सिर पर
विशेष शाही पगड़ी बांधी जाती थी। मेवाड़, मारवाड़ या ढूंढाड़ के
इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहाँ राजा की मृत्यु के
तुरंत बाद श्मशान से लौटते ही
या शोक की अवधि समाप्त
होते ही 'पाग दस्तूर' या 'राजतिलक' किया जाता था। यह इस बात
की सार्वजनिक घोषणा होती थी कि अब
राज्य की संप्रभुता, न्याय,
सीमा सुरक्षा और प्रजा के
संरक्षण की जिम्मेदारी इस
नए शासक के कंधों पर
है।
समाज में
विस्तार:
समय
चक्र बदला और यह शाही
परिपाटी धीरे-धीरे सामंती व्यवस्था से निकलकर आम
समाज का हिस्सा बन
गई। जब किसी परिवार
के मुखिया (पिता या बड़े भाई)
की मृत्यु होती, तो परिवार के
भीतर संपत्ति, जमीन-जायदाद और पारिवारिक दायित्वों
को लेकर कोई कलह, बिखराव या कानूनी विवाद
न हो, इसके लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों
और पंच-पटेलों की उपस्थिति में
ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी पहनाई
जाने लगी। यह इस बात
का प्रतीक था कि अब
वह घर का नया
'मुखिया' है और परिवार
के भरण-पोषण, छोटी बहनों की शादी, कर्ज़
चुकाने तथा कुल के मान-सम्मान
की जिम्मेदारी उसकी है। यहाँ ननिहाल पक्ष द्वारा लाई गई पगड़ी (मायरे
की पाग) और ससुराल पक्ष
की पगड़ी का भी अपना
सामाजिक महत्व था।
वर्तमान स्वरूप:
औपचारिकता,
मृत्युभोज और रूढ़िवादिता का
घालमेल
कालांतर
में जो रस्म जिम्मेदारी
और उत्तरदायित्व के व्यावहारिक हस्तांतरण
के लिए शुरू हुई थी, वह आज मात्र
एक औपचारिक और रूढ़िवादी लीक
बनकर रह गई है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, अब यह रस्म
केवल किसी विशेष 'मुखिया' या बुजुर्ग की
मृत्यु तक सीमित नहीं
रही, बल्कि परिवार में किसी भी पुरुष सदस्य
की असमय मृत्यु के बाद भी,
विशेषकर बारहवीं या तेरहवीं के
संस्कार के समय, इसे
एक अनिवार्य रूढ़ि की तरह निभाया
जाने लगा है। आज के एकल
परिवारों (Nuclear
Families) के दौर में, जहाँ संपत्ति के कानून स्पष्ट
हैं, न्यायपालिका है और हर
व्यक्ति आत्मनिर्भर है, वहाँ इस रस्म का
पुराना प्रशासनिक और व्यावहारिक महत्व
लगभग समाप्त हो चुका है।
विशिष्ट सामाजिक
उदाहरण
और
विसंगतियाँ:
1. कर्ज और
झूठी
प्रतिष्ठा
का
बोझ:
ग्रामीण
अंचलों में आज भी पगड़ी
की रस्म अकेले नहीं आती; इसके साथ 'मृत्युभोज' (मौसर/नुक्ता) की कुप्रथा भी
अनचाहे रूप से जुड़ जाती
है। समाज के डर और
'लोग क्या कहेंगे' के दबाव में
आकर, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार
भी भारी-भरकम खर्च करते हैं। कई बार तो
घर के कमाऊ सदस्य
की मृत्यु के सदमे से
उबरने से पहले ही
परिवार को पगड़ी दस्तूर
और पंच-पटेलों के भोजन के
लिए अपनी ज़मीन, मकान, जेवर गिरवी रखने पड़ते है या ऊंचे
ब्याज पर कर्ज़ लेना
पड़ता है।
2. समानता
का
अभाव:
यह
रस्म पूरी तरह से पुरुष-प्रधान
है। यदि किसी परिवार में केवल बेटियाँ हैं, तो वहाँ पगड़ी
किसे बांधी जाए, इस पर आज
भी विवाद खड़े हो जाते हैं,
जो कि आधुनिक युग
में लैंगिक समानता के सिद्धांतों के
विपरीत है।परंतु प्राय: सोशल मीडिया पर यह खबरें
भी वायरल होने लगी है कि यदि
किसी परिवार में सिर्फ बेटियां है तो इस
रूढ़िवादी रस्मों को जारी रखने
के लिए आजकल बेटियों द्वारा पगड़ी दस्तूर करना प्रारंभ कर दिया है
और बड़े शान से फोटो के
साथ प्रचारित किया जाता है।
बदलाव की
बयार:
शहरी
और ग्रामीण परिवेश का अंतर्विरोध
आज
हमारा समाज वैचारिक धरातल पर दो बिल्कुल
अलग और विरोधाभासी दिशाओं
में जाता दिखाई दे रहा है:
शहरी क्षेत्रों
में
बढ़ती
चेतना:
शिक्षा,
आधुनिक दृष्टिकोण और व्यस्त जीवनशैली
के कारण शहरी और महानगरीय इलाकों
में इस परंपरा का
तेजी से लोप हुआ
है। लोग अब कर्मकांडों के
स्थान पर व्यावहारिक और
तार्किक जीवन को महत्व दे
रहे हैं। शहरी समाज यह भली-भांति
समझ चुका है कि किसी
धार्मिक ग्रंथ (वेद, पुराण या गीता) में
स्थान न होने के
कारण यह रस्म केवल
एक सामाजिक आडंबर है, जिसे आसानी से छोड़ा जा
सकता है। शहरों में अब लोग शोक
सभा (बेठणा) या शांति पाठ
तक ही सीमित रहते
हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों
में
रूढ़ि
का
गहरा
प्रभाव:
इसके
विपरीत, ग्रामीण भारत और विशेषकर राजस्थान
के ढाणियों व गाँवों में
आज भी यह प्रथा
अपनी पूरी जड़ता के साथ अनवरत
जारी है। गाँवों में इसे कुल की प्रतिष्ठा, सामाजिक
स्वीकार्यता और बिरादरी में
बने रहने के पैमाने से
जोड़कर देखा जाता है। यदि कोई परिवार इस रस्म को
करने से मना करता
है, तो उसे सामाजिक
उपेक्षा का सामना करना
पड़ता है। इसलिए, आज ग्रामीण अंचलों
में इस प्रथा को
त्यागने और इसके प्रति
व्यापक जनजागरण फैलाने की महती आवश्यकता
है।
निष्कर्ष
पगड़ी
रस्म का इतिहास गवाह
है कि यह समय,
काल और परिस्थिति की
मांग के अनुसार पैदा
हुई एक तात्कालिक सामाजिक
व्यवस्था थी। चूंकि इसका कोई आध्यात्मिक, शास्त्रीय या धार्मिक आधार
नहीं है, इसलिए इसे समय की मांग के
अनुसार बदला या पूरी तरह
त्यागा जा सकता है।
परंपराएं समाज को जोड़ने, सहारा
देने और जीवन को
सुगम बनाने के लिए होती
हैं, न कि शोक
में डूबे परिवार को रूढ़ियों की
बेड़ियों में जकड़कर आर्थिक रूप से बर्बाद करने
के लिए।
अब
समय आ गया है
कि हम लकीर के
फकीर बनने के बजाय प्रगतिशील
सोच को अपनाएं। ग्रामीण
और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों
को आगे आकर इस विषय पर
खुलकर विमर्श करना होगा। जब तक हम
व्यर्थ के आडंबरों और
सामाजिक दिखावे को नहीं छोड़ेंगे,
तब तक एक सशक्त
और तार्किक समाज का निर्माण असंभव
है। आइए, इस रूढ़िवादी प्रथा
का त्याग कर समाज को
एक स्वस्थ, विवेकपूर्ण और आधुनिक भविष्य
की ओर ले जाने
का संकल्प लें।
Disclaimer : इस लेख में
जो भी बातें, राय
या विश्लेषण लिखे गए हैं, वे
पूरी तरह से लेखक के
अपने निजी विचार है। यह जरूरी नहीं
कि समाजहित एक्सप्रेस भी लेखक के
विचारों से सहमत हो।

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