अखिल भारतीय रैगर महासभा चुनाव 2026 : प्रत्याशियों से कुछ असुविधाजनक लेकिन जरूरी सवाल
🙏🌹बाबू लाल
बारोलिया,
अजमेर
🌹🙏
29 नवंबर
2026 को अखिल भारतीय रैगर महासभा की कार्यकारिणी के
चुनाव होने हैं। चुनावी मैदान में पुराने चेहरे भी हैं और
नए चेहरे भी होंगे। सोशल
मीडिया पर संकल्प-पत्रों,
आकर्षक तस्वीरों और बड़े-बड़े
वादों की शुरुआत हो
चुकी है।
कहीं
सामाजिक एकता का संकल्प है,
कहीं शिक्षा और रोजगार का
वादा है, कहीं युवाओं एवं महिलाओं के सशक्तिकरण की
बात है तो कहीं
राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सपना दिखाया
जा रहा है।
हर
प्रत्याशी स्वयं को कर्मठ, ईमानदार,
पारदर्शी, समाजसेवी और परिवर्तनकारी बताने
में पीछे नहीं है।
लेकिन समाज
को
अब
एक
सवाल
पूछना
चाहिए—
“इतने
वर्षों से जो समस्याएँ
समाज को पीछे खींच
रही हैं, उनके विरुद्ध आपका संकल्प कहाँ है? हर तीन चार
साल में कार्यकारिणी का गठन होता
आया है और अदल
बदल कर वही पदाधिकारी
चुनाव जीतकर समाज का नेतृत्व संभाल
रहे है, उनका रिपोर्ट कार्ड कहां है?"
क्या
केवल शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक एकता
की खोखली बातें करने से समाज का
वास्तविक उत्थान हो पाएगा?
जब
तक समाज अंधविश्वास, पाखंड, रूढ़िवाद, नशा, दहेज, मृत्यु भोज, दिखावा, अनावश्यक सामाजिक फिजूल खर्च और झूठी प्रतिष्ठा
की होड़ से मुक्त नहीं
होगा, तब तक आर्थिक
और सामाजिक प्रगति अधूरी ही रहेगी।
मंदिर और
धर्मशाला
बनेंगे
या
भविष्य
बनेगा?
यह
प्रश्न किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था
के विरुद्ध नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था
और पूजा-पद्धति का अधिकार है।
लेकिन
प्रश्न यह है कि
समाज का सामूहिक धन
किस पर खर्च होना
चाहिए?
क्या
सामुदायिक संस्थाओं एवं
संगठनों के धन का
बड़ा हिस्सा—
मंदिरों,
धार्मिक भवनों, पूजा-पाठ, कलश यात्राओं, जागरणों, धार्मिक मेलों और अन्य धार्मिक
आयोजनों पर खर्च होता
रहे, जबकि उसी समाज के अनेक बच्चे
अच्छी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, पुस्तकें,
छात्रावास, तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार के
अवसरों के लिए संघर्ष
करते रहें? उन्हीं समाज के गरीब एवं
कमजोर व्यक्ति अभावों में जीता रहे?
क्या
हमें इस प्राथमिकता पर
खुलकर विचार नहीं करना चाहिए?
ईंट-पत्थर
की
इमारत
से
ज्यादा
जरूरी
ज्ञान
की
इमारत
है
समाज
के पास सीमित संसाधन हैं। इसलिए प्राथमिकता तय करनी होगी।
यदि
सामुदायिक धन उपलब्ध है
तो क्यों न उसे—
स्कूलों
और कॉलेजों की स्थापना एवं
सहयोग, छात्रावास, पुस्तकालय एवं अध्ययन केंद्र,
प्रतियोगी परीक्षा
प्रशिक्षण,
कौशल
विकास, रोजगार मार्गदर्शन, स्वरोजगार एवं उद्यमिता, गरीब विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति, महिलाओं
के कौशल विकास, जरूरतमंदों की चिकित्सा सहायता
और युवाओं के केरियर निर्माण
गरीब और कमजोर को
आर्थिक एवं अन्य सहायता आदि पर लगाया जाए?
एक
धार्मिक आयोजन कुछ घंटे या कुछ समय
मन की शांति की
प्रेरणा दे सकता है,
लेकिन एक पुस्तकालय, स्कूल,
कॉलेज कई पीढ़ियों की
दिशा बदल सकता है।
एक
दिखावटी आयोजन कुछ समय के लिए भीड़
जुटा सकता है, लेकिन एक छात्र की
शिक्षा पूरे परिवार की दशा बदल
सकती है।
क्या प्रत्याशी
यह
संकल्प
लेने
को
तैयार
हैं?
यदि
कोई उम्मीदवार सचमुच समाज परिवर्तन की बात करता
है तो वह अपने
संकल्प-पत्र में स्पष्ट रूप से लिखे—
“समाज
की संस्थाओं के सामुदायिक धन
का उपयोग प्राथमिक रूप से शिक्षा, चिकित्सा,
रोजगार, कौशल विकास, छात्रावास, पुस्तकालय, विद्यार्थियों एवं गरीबों की सहायता और
आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए किया
जाएगा। धार्मिक अथवा अनुत्पादक आयोजनों पर सामुदायिक धन
के उपयोग को सीमित/निरुत्साहित
करने के लिए पारदर्शी
नियम बनाए जाएंगे।”
और
यह भी—
“समाज
की किसी भी संस्था के
धन का उपयोग केवल
पारदर्शी, निर्धारित और समाजहितकारी नियमों
के अनुसार होगा तथा प्रत्येक आय-व्यय का
सार्वजनिक लेखा-जोखा उपलब्ध कराया जाएगा।”
यही
वह संकल्प है जिसकी परीक्षा
चुनाव के बाद होगी।
समाज सुधार
की
बात
करना
आसान
है,
कुरीतियों
के
विरुद्ध
खड़ा
होना
कठिन
दहेज के
विरुद्ध
बोलना
आसान
है,
लेकिन
अपने
परिवार
में
दहेज
रहित
विवाह
करना
कठिन
है।
मृत्युभोज, गंगा
प्रसादी,
पहरावनी
पर
मनमोहक
संदेश
देना
आसान
है
लेकिन
इन
पर
प्रतिबंध
लागू
कराना मुश्किल है
दिखावे के
विरुद्ध
भाषण
देना
आसान
है,
लेकिन
सामाजिक
प्रतिष्ठा
की
होड़
छोड़ना
कठिन
है।
नशामुक्ति की
बात
करना
आसान
है,
लेकिन
नशे
के
कारोबार
और
उसके
सामाजिक
संरक्षण
के
विरुद्ध
खड़ा
होना
कठिन
है।
अंधविश्वास के
विरुद्ध
लिखना
आसान
है,
लेकिन
पाखंड
के
आर्थिक
तंत्र
को
चुनौती
देना
कठिन
है।
पाखंड, कुरीतियों
और
रूढ़िवादी
परम्पराओं
पर
लच्छेदार
भाषण
देना
सरल
है
लेकिन
इनको
रोकना
कठिन
है।
और यही
किसी
भी
सामाजिक
नेतृत्व
की
वास्तविक
परीक्षा
है।
इस
बार मतदाता केवल वादे न सुनें—हिसाब
भी मांगें
पूर्व
पदाधिकारियों से पूछा जाना
चाहिए—
आपके पिछले
कार्यकाल
में
क्या
हुआ?
कितना धन
आया?
कहाँ
खर्च
हुआ?
कितने विद्यार्थियों
को
लाभ
मिला?
कितने युवाओं
को
रोजगार
या
कौशल
से
जोड़ा
गया?
कितने गरीबों,
असहायों
और
पीड़ितों
की
सहायता
की?
कितने सामाजिक
बुराइयों
और
कुरीतियों
के
विरुद्ध
अभियान
चलाए
गए?
कितनी संस्थाओं
में
पारदर्शी
लेखा-जोखा
उपलब्ध
कराया
गया?
और
नए प्रत्याशियों से पूछा जाना
चाहिए—
आपकी कार्ययोजना
क्या
है?
समय-सीमा
क्या
है?
धन कहाँ
से
आएगा?
उसका उपयोग
कैसे
होगा?
समाज आपके
काम
का
मूल्यांकन
कैसे
करेगा?
AI की
तस्वीर
नहीं,
वास्तविक
कार्य
का
रिपोर्ट
कार्ड
चाहिए
आज
सोशल मीडिया पर आकर्षक तस्वीरें
और AI से तैयार किए
गए प्रभावशाली पोस्टर आसानी से बनाए जा
सकते हैं। लेकिन समाज को अब तस्वीर
नही,'कार्य का रिपोर्ट कार्ड
चाहिए।
समाज
को यह देखना चाहिए
कि प्रत्याशी ने पिछले वर्षों
में अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन
में क्या ठोस कार्य किया है।
क्योंकि—
संकल्प-पत्र भविष्य का दावा है,
लेकिन
पिछला कार्य उसका प्रमाण है।
और सबसे
बड़ा
सवाल—क्या
हम
अपनी
प्राथमिकताएँ
बदलने
का
साहस
करेंगे?
यदि
समाज वास्तव में गरीबी से ऊपर उठना
चाहता है, तो केवल राजनीतिक
सशक्तिकरण की बात पर्याप्त
नहीं है। हमें यह तय करना
होगा कि—
धन दिखावे
पर
खर्च
होगा
या
शिक्षा
पर?
सामुदायिक संसाधन
धार्मिक
आयोजनों
पर
लगेंगे
या
चिकित्सा
पर?
युवाओं को
केवल
धार्मिक
भीड़
का
हिस्सा
बनाया
जाएगा
या
ज्ञान,तर्क और कौशल
की
शक्ति
दी
जाएगी?
हम मंदिर
और
धर्मशाला
बनाते
रहेंगे
या
स्कूल,
कॉलेज,
पुस्तकालय
और
छात्रावास
भी
बनाएंगे?
हम जागरण,
कलश
यात्रा
और
धार्मिक
मेले करते रहेंगे
या
युवाओं
के
भविष्य
के
लिए
जागरूकता
का
अभियान
भी
चलाएंगे?
यह
आस्था बनाम अनास्था का प्रश्न नहीं
है।
यह
सामुदायिक संसाधनों की प्राथमिकता और
सामाजिक भविष्य का प्रश्न है।
अब
समाज को तय करना
है कि उसे कैसा
नेतृत्व चाहिए
ऐसा नेतृत्व
जो
केवल
मंचों
पर
भाषण
दे?
या ऐसा
नेतृत्व
जो
समाज
के
भीतर
मौजूद
कठिन
सवालों
से
भी
टकराए?
ऐसा नेतृत्व
जो
केवल
पद
और
प्रतिष्ठा
की
राजनीति
करे?
या ऐसा
नेतृत्व
जो
शिक्षा,
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण,
तकनीक,
रोजगार,
चिकित्सा,
कौशल,
आत्मनिर्भरता
और
सामाजिक
सुधार
को
प्राथमिकता
दे?
समाज
को अब वादों के
इंद्रधनुष से आगे बढ़कर
कार्ययोजना मांगनी होगी।
पद
पाने की होड़ नहीं—जिम्मेदारी निभाने की होड़ हो।
फोटो
और पोस्टर नहीं—कार्य का प्रमाण हो।
संकल्पों
की सूची नहीं—समयबद्ध रोडमैप हो।
धार्मिक
दिखावा नहीं—ज्ञान और विवेक की
रोशनी हो।
और
सबसे बढ़कर—सामुदायिक धन का उपयोग
समाज की आने वाली
पीढ़ियों के भविष्य के
लिए हो।
क्योंकि
समाज की असली उन्नति
तब होगी, जब हमारी अगली
पीढ़ी के हाथ में
केवल पूजा की सामग्री नहीं,
बल्कि किताब, कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता का
साधन होगा।
अब
प्रश्न यह नहीं होना
चाहिए कि “कौन चुनाव जीत रहा है?”
प्रश्न
यह होना चाहिए—
“कौन
समाज
की
दिशा
बदलने
का
साहस
रखता
है?”
Disclaimer : इस लेख में जो भी बातें, राय या विश्लेषण लिखे गए हैं, वे पूरी तरह से लेखक के अपने निजी विचार है। यह जरूरी नहीं कि समाजहित एक्सप्रेस भी लेखक के विचारों से सहमत हो।


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