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ज्ञान से जागृति, जागृति से परिवर्तन: बुद्ध के धम्म और बाबासाहेब के विचारों से बनेगा समतामूलक समाज - श्रीप्रकाश सिंह निमराजे



गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष ने दिया सामाजिक परिवर्तन का मंत्र - शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित बनो 

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) । नई दिल्ली/भोपाल। गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने अपने विशेष लेख में कहा है कि किसी भी समाज की असली प्रगति आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि शिक्षा की समानता, महिलाओं-वंचितों के सम्मान और न्यायपूर्ण संस्थाओं से मापी जाती है।

उन्होंने कहा - "ज्ञान से जागृति, जागृति से परिवर्तन" यही स्थायी सामाजिक परिवर्तन का मूल मंत्र है।

भगवान बुद्ध का धम्म: विवेक और करुणा का मार्ग

श्री निमराजे ने कहा कि भगवान बुद्ध का धम्म सिर्फ आस्था नहीं, जीवन को समझने का मार्ग है। चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग व्यक्ति को पूर्वाग्रहों से निकालकर विवेक से निर्णय लेना सिखाते हैं। करुणा का मतलब सिर्फ दया नहीं, दुख के कारणों को मिटाने का प्रयास है।

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा - किसी छात्र को एक बार किताब देना मदद है, लेकिन उसके लिए नियमित शिक्षा और मार्गदर्शन की व्यवस्था करना सच्चा सामाजिक योगदान है।

बाबासाहेब का मंत्र: शिक्षा सामाजिक मुक्ति का माध्यम

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार बताया। श्री निमराजे ने कहा कि आज डिजिटल शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगारपरक कौशल तक समान पहुँच सामाजिक न्याय के लिए जरूरी है, खासकर ग्रामीण, गरीब, महिला और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए।उन्होंने 5 प्रकार की साक्षरता पर जोर दिया:

1.       संवैधानिक साक्षरता,     2. डिजिटल साक्षरता,     3. वित्तीय साक्षरता,     4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण,          5. सामाजिक साक्षरता

शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित बनो

निमराजे ने बाबासाहेब के त्रिसूत्र को आज के संदर्भ में समझाया:

·         वैचारिक संघर्ष: अंधविश्वास और भेदभाव को तर्क से चुनौती देना

·         सामाजिक संघर्ष: अन्याय के खिलाफ जनजागरूकता और सामूहिक प्रयास

·         संस्थागत संघर्ष: कानून और संविधान के दायरे में अधिकारों की रक्षा

उन्होंने कहा कि संघर्ष का मतलब नफरत नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जहाँ अन्याय के लिए जगह ही न हो।

संविधान है सामाजिक न्याय का आधार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि समानता सिर्फ नैतिक आदर्श नहीं, संवैधानिक अधिकार है। लेकिन अधिकार और उसके लाभ के बीच की खाई को नागरिक जागरूकता और प्रभावी प्रशासन से ही पाटा जा सकता है।

युवाओं और महिलाओं की भागीदारी जरूरी

स्थायी परिवर्तन के लिए युवाओं और महिलाओं को सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व में समान भागीदारी देनी होगी। GKSSS इस दिशा में डिजिटल साक्षरता, कानूनी जागरूकता और नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।

GKSSS की कार्ययोजना

संस्था 6 प्रमुख क्षेत्रों में काम करेगी - शिक्षा मार्गदर्शन केंद्र, संवैधानिक जागरूकता अभियान, युवा नेतृत्व कार्यक्रम, महिला सशक्तीकरण, बौद्ध धम्म और मानवीय मूल्यों पर संवाद, और सामाजिक समस्याओं का प्रमाण-आधारित दस्तावेजीकरण।

निष्कर्ष में श्री निमराजे ने कहा - "हमें शिक्षा को अधिकार, विवेकपूर्ण संघर्ष को जिम्मेदारी और संगठन को जनकल्याण का माध्यम बनाना होगा। लक्ष्य ऐसा समाज हो जहाँ समानता सिर्फ विचार नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन का वास्तविक अनुभव बने।"

 


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