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तारीखों में उम्र गंवा रहा है आम नागरिक, पहचान वाले का काम चुटकियों में - कब जागेंगे जिम्मेदार?

 

गरीब की अर्जी पर थम जाती है साहब की कलम, रसूखदार की आहट पर दौड़ती है फाइल! सरकारी दफ्तरों में आम आदमी का दर्द

दिल्ली , समाजहित एक्सप्रेस ( रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया ) ।  नई दिल्ली। क्या सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए पात्रता से ज्यादा पहचान और अधिकार से ज्यादा पहुँच जरूरी हो गई है? यह सवाल आज हर आम आदमी के मन में है, जो अपने जायज काम के लिए महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। सरकारी कार्यालयों में बैठे कुछ लापरवाह अधिकारियों-कर्मचारियों की कार्यशैली देखकर लगता है जैसे आम जनता का काम करना उनकी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एहसान हो!

फाइल को लग जाते हैं पंख!

एक तरफ गरीब की फाइल साहब की मेज पर महीनों धूल फांकती रहती है, उसे आज-कल और अगले हफ्ते का आश्वासन थमा दिया जाता है। वहीं किसी रसूखदार का फोन आते ही वही फाइल ऐसी दौड़ती है मानो उसमें पंख लग गए हों!आम आदमी के लिए नियमों की दुहाई, प्रक्रिया की लंबाई और कागजों की कमी - लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति के लिए वही नियम मौन और वही प्रक्रिया छोटी!

आम आदमी तारीखों में गंवा रहा उम्र

एक साधारण नागरिक प्रार्थना पत्र पर प्रार्थना पत्र देता है, कीमती समय और मेहनत खर्च करता है, लेकिन समाधान की जगह सिर्फ तारीख मिलती है। पहचान वाला आता है और काम करवाकर चला जाता है।आखिर यह कैसा न्याय है?अधिकारियों को कड़वी मगर जरूरी नसीहतयाद रखिए, सरकारी कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं है। वेतन जनता के पैसे से मिलता है, पद के साथ जिम्मेदारी जुड़ी है। जनता दरवाजे पर बेइज्जती करवाने नहीं आती। अगर कमी है तो स्पष्ट बताइए, दस्तावेज अधूरा है तो एक बार में बताइए, बार-बार चक्कर मत कटवाइए। कुर्सी पर बैठकर इंतजार करवाना आसान है, लेकिन जवाबदेही के कटघरे में जवाब देना आसान नहीं होगा।

जनता की कलम चलेगी तो हिसाब होगा!

याद रखिए, जनता की खामोशी को कमजोरी मत समझिए। आज जनता प्रार्थना पत्र दे रही है, कल आपकी कार्यशैली पर सवाल भी उठाएगी। आज आप जवाब देने से बच रहे हैं, लेकिन जवाबदेही से हमेशा नहीं बच पाएंगे।जिस दिन जनता की कलम चलेगी, उस दिन हर लापरवाही का हिसाब होगा, हर अधूरी फाइल पर सवाल होगा!

अंत में दो टूक -

अगर आप सरकारी कर्मचारी या अधिकारी है,

आपको आपकी मेहनत का वेतन मिलता है।

कर्तव्य और ईमानदारी से जनता की सेवा करें,

बिना भेदभाव के समय पर काम को निपटाएं।

आप जनता के सेवक हैं, सेवक बनकर ही रहिए,

लोकतंत्र में जनता अधिकारी की मोहताज नहीं।

अधिकारी देश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं,

सरकारी कुर्सी पर आप जिम्मेदारी का प्रतीक है। 

 

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