संपादकीय:
किसी भी
लोकतांत्रिक देश
की
आत्मा
उसके
संविधान में
बसती
है।
भारत
जैसे
विशाल
और
विविधता से
भरे
देश
को
एक
सूत्र
में
पिरोने
वाला
हमारा
संविधान दुनिया
का
सबसे
बड़ा
लिखित
दस्तावेज है।
हाल
ही
में
आयोजित
हुई द्वितीय 'संविधान ज्ञान प्रतियोगिता' युवाओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों से रूबरू कराने की दिशा में एक सराहनीय और युगांतरकारी कदम है। यह
आयोजन
मात्र
एक
सामान्य ज्ञान
की
प्रतियोगिता नहीं
है,
बल्कि
यह
सजग
और
प्रबुद्ध नागरिक
तैयार
करने
का
एक
राष्ट्रीय अनुष्ठान है।
आज के
डिजिटल
युग
में,
जहाँ
युवा
पीढ़ी
सूचनाओं के
महासागर में
तैर
रही
है,
वहाँ
अपने
मौलिक
अधिकारों, राज्य
के
नीति
निदेशक
तत्वों
और
संवैधानिक व्यवस्थाओं की
गहरी
समझ
होना
बेहद
जरूरी
है।
अक्सर
देखा
जाता
है
कि
लोग
अपने
अधिकारों के
प्रति
तो
मुखर
रहते
हैं,
लेकिन
जब
बात
मौलिक
कर्तव्यों की
आती
है,
तो
उदासीनता दिखाई
देती
है।
यह
प्रतियोगिता नई
पीढ़ी
को
यह
सिखाती
है
कि
अधिकार
और
कर्तव्य एक
ही
सिक्के
के
दो
पहलू
हैं।
इस तरह
की
प्रतियोगिताओं की
सार्थकता निम्नलिखित बिंदुओं में
देखी
जा
सकती
है:
·
लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास: यह युवाओं
में
न्याय,
स्वतंत्रता, समता
और
बंधुत्व की
भावना
को
मजबूत
करती
है।
·
भविष्य के नेतृत्व का निर्माण: जो युवा
आज
देश
के
कानून
और
शासन
प्रणाली को
समझ
रहे
हैं,
वही
कल
देश
को
सही
दिशा
में
ले
जाने
वाले
नीति-निर्माता बनेंगे।
· सजग नागरिकता: जब नागरिकों को संविधान का ज्ञान होता है, तो वे व्यवस्था पर सवाल उठाने और लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी बनाने में सक्षम होते हैं।
इस प्रतियोगिता का
वास्तविक उद्देश्य केवल
पुरस्कार जीतना
नहीं,
बल्कि
संविधान की
प्रस्तावना (Preamble) में छिपे
संदेश
को
अपने
आचरण
में
ढालना
है।
आवश्यकता इस
बात
की
है
कि
इस
तरह
के
आयोजनों को
केवल
एक
वार्षिक कार्यक्रम तक
सीमित
न रखकर, हमारे दैनिक
शैक्षणिक जीवन
का
हिस्सा
बनाया
जाए।
जब
देश
का
हर
युवा
संविधान को
जानेगा,
तभी
हमारा
लोकतंत्र अपनी
वास्तविक ऊंचाइयों को
छू
सकेगा।
हम,
भारत के लोग... SGP दिल्ली के
पदाधिकारियों एवं
सदस्यों ने
'संविधान ज्ञान प्रतियोगिता' कार्यक्रम को
सफल
बनाने
में
महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई, वे सभी बधाई
के पात्र है ।


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