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गुस्सा - दुख का सबसे बड़ा कारण: खुशी का रास्ता मन से होकर गुजरता है

 


दिल्ली , समाजहित एक्सप्रेस ( रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया ) । दुख बाहर से नहीं, हमारे मन से आता है। हम सोचते हैं कि पैसा, ताकत या रुतबा खुशी देगा, पर असली खुशी मन की शांति में है। पिता-बेटे में लड़ाई अक्सर ईगो से होती है। दोनों को दुख होता है, पर कोई सुनना नहीं चाहता।

जब हम बेइज्जत महसूस करते हैं, तो जवाब में बेइज्जती करते हैं ताकि दूसरे को दुख हो, यह सोचकर कि इससे हमें अच्छा लगेगा लेकिन असल में इससे हमें और भी बुरा लगता है! दोनों पार्टियों को सज़ा मिलती है!

गुस्सा पूरी तरह से कोई साइकोलॉजिकल बात भी नहीं है, क्योंकि हमारा शरीर ही हमारा मन है और इसी तरह हमारा मन ही हमारा शरीर है! क्या किसी को एहसास हुआ है कि जब उन्हें गुस्सा आता है, तो उनका दिल तेज़ी से धड़कता है, साँसें तेज़ होती हैं, स्ट्रेस होता है, लड़ने के लिए तैयार होते हैं, मुट्ठियाँ भींच लेते हैं, दाँत पीसते हैं, और आँखों से ज़हर निकलता है।

दुख कम करना सीखने में गुस्से की आग को बुझाना सीखना शामिल है :

इसलिए बेहतर है कि वापस जाएं, शांति बनाए रखें, अपने दुख का ध्यान रखें और उसे बुझा दें। क्योंकि अगर आपके घर में आग लगी है, तो वापस जाकर आग बुझाना बेहतर है, बजाय इसके कि आग लगाने वाले को ढूंढने की कोशिश करें, नहीं तो आग लगाने वाले को ढूंढने से पहले ही घर जल जाएगा।


समाधान क्या है? गुस्सा नहीं, समझदारी चुनिए

जब गुस्सा आए, तो तुरंत जवाब मत दीजिए

गहरी सांस लीजिए, चुप रहिए, शांत होइए

घर में आग लगी हो तो पहले आग बुझाते हैं, आग लगाने वाले को नहीं ढूंढते

गुस्सा आपके अंदर का बीज है, दूसरे में नहीं।

उसे प्यार से समझिए, जैसे बच्चे को समझाते हैं।

सुनना सीखिए, बिना जजमेंट के।

अर्थ: गुस्से को दबाना नहीं, बदलना है। शांत मन ही सुखी जीवन है।

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