🙏🌹बाबू लाल बारोलिया,
अजमेर 🌹🙏
समाज का हर
बुद्धिजीवी, हर जागरूक व्यक्ति आज एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ा है—क्या
हम केवल बातें करने वाले रहेंगे, या समाज को बदलने वाले भी बनेंगे?
किसी भी समाज
की वास्तविक पहचान उसकी आर्थिक सम्पन्नता से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक संस्कार, वैज्ञानिक
सोच, शिक्षा, संगठन और प्रगतिशील विचारधारा से होती है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों
ने समय के साथ अपनी रूढ़ियों, अंधविश्वासों और कुरीतियों को त्यागकर ज्ञान, शिक्षा
और तर्क का मार्ग अपनाया, वही समाज विकास की ऊँचाइयों तक पहुँचे। इसके विपरीत जो समाज
परम्पराओं के नाम पर रूढ़िवादिता से चिपके रहे, वे समय के साथ पिछड़ते चले गए।
दिनांक
04 अगस्त 2024 को हरिद्वार में अखिल भारतीय रैगर महासभा (पंजी.) के हरिद्वार कमेटी
के पदाधिकारियों ने पंडित गंगाराम सेवा समिति ट्रस्ट के साथ अस्थि विसर्जन और बही-खाते
में नाम लिखवाने के लिए मात्र पाँच सौ रुपये का समझौता किया। यह खबर पढ़कर मन में एक
गहरी टीस उठी। यद्यपि इस पहल का उद्देश्य आर्थिक शोषण कम करना हो सकता है, परन्तु इसने
मेरे मन में एक गहरा प्रश्न भी खड़ा किया—क्या समाज सुधार का अर्थ केवल कर्मकांडों
को सस्ता करना है, या उन कर्मकांडों की आवश्यकता और प्रासंगिकता पर भी विचार करना चाहिए?
यदि हम एक
ओर समाज से अंधविश्वास, पाखंड, कर्मकांड और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की बात
करें और दूसरी ओर उन्हीं परम्पराओं को नई व्यवस्था देकर आगे बढ़ाएँ, तो यह आत्ममंथन
का विषय अवश्य बनता है। यह दोहरा रवैया हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। समाज सुधार केवल
व्यवस्थाओं में परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि सोच में परिवर्तन का नाम है।
जब तक हमारे
समुदाय में अंधविश्वास, पाखंड, ब्राह्मणवाद, मनुवाद और निरर्थक कर्मकांड जिंदा रहेंगे,
तब तक न तो सामाजिक एकता मजबूत होगी और न ही राजनीतिक ताकत।
एक ओर हम
मंचों पर चिल्लाते हैं—“कुरीतियाँ मिटाओ, अंधविश्वास तोड़ो,
कर्मकांड खत्म करो!” दूसरी ओर उन्हीं कर्मकांडों को औपचारिक मान्यता दे देते हैं। यह
दोहरा चरित्र हमारी सबसे बड़ी बीमारी है। यह बीमारी हमें अंदर से खोखला कर रही है।
जब तक हमारे भीतर अंधविश्वास की जड़ें जिंदा हैं, जब तक हम ब्राह्मणवाद और मनुवाद की
छाया में घुटने टेकते रहेंगे, जब तक हम देवी-देवताओं से मन्नत माँगकर राजनीतिक सत्ता
पाने का सपना देखते रहेंगे— तब तक न तो सामाजिक एकता बनेगी, न
राजनीतिक ताकत, और न ही सम्मान। हम सालों से मन्नत माँग रहे हैं। देवी-देवताओं से भी,
बड़े नेताओं से भी। परिणाम? कुछ नहीं। क्योंकि मन्नत माँगने वाले कभी शासक नहीं बनते।
संगठित और जागरूक समाज ही इतिहास बदलता है।
याद रखिए—समाज
व्यक्तियों से बनता है। अगर हम में से प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि “मेरे एक सुधरने
से क्या होगा”, तो सुधार कभी नहीं आएगा। लेकिन अगर हम यह समझें कि हम
और आप जैसे हजारों लोग मिलकर समाज हैं, तो बदलाव अवश्यंभावी है। एक दीपक अंधेरे को
नहीं मिटा सकता, पर सैकड़ों दीपक मिलकर रात को दिन बना देते हैं।
मेरी समाज
के प्रत्येक व्यक्ति से अपील है—
चाहे आप शिक्षित
हों या अशिक्षित, नौकरीपेशा हों या मजदूर, अमीर हों या गरीब—
अपने निजी
झगड़ों, स्वार्थ और अहंकार को एक तरफ रखिए। समाज हित में एक कदम बढ़ाइए। अनावश्यक खर्च
वाली रस्मों को सरल बनाइए। बच्चों को शिक्षा और तर्क की ओर प्रेरित कीजिए। आपसी मतभेद
भुलाकर संगठन की ताकत बढ़ाइए।
हमारे महापुरुषों
ने हमें स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा और न्याय का अधिकार दिलाया। 1 अगस्त 2024 का सुप्रीम
कोर्ट का आरक्षण संबंधी फैसला हमें याद दिलाता है कि असंगठित समाज अपने संवैधानिक अधिकारों
की रक्षा भी नहीं कर पाता। बहुजन होकर भी अगर हम बिखरे रहेंगे, तो मुट्ठी भर ताकतें
हमारे हक पर कुठाराघात करती रहेंगी।
आज जरूरत
है कि हम केवल आलोचक न बनें, बल्कि कर्ता बनें।
हर कदम ऐसा
चलो कि निशान बन जाए,
काम ऐसा करो
कि पहचान बन जाए।
जिंदगी तो
सभी काट लेते हैं मेरे दोस्त,
तू जिंदगी
ऐसे जी कि समाज में मिसाल बन जाए।
रैगर समाज
का भविष्य हम सबके हाथ में है। अगर हम आज नहीं जागे, तो कल बहुत देर हो चुकी होगी।
आइए, रूढ़ियों को तोड़ें, अंधविश्वास को छोड़ें, एकता का निर्माण करें और अपने बच्चों
के लिए एक गर्व करने लायक समाज छोड़कर जाएँ।

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